
धर्म हमेशा से ही चर्चित विषय रहा है।जो भद्रजनों के द्वारा ज्यादातर सुनने को मिलता है।खासकर वृद्धो द्वारा।
क्या कारण है कि,आज तक के धर्म में सिर्फ बुढे़ ही उत्सुक रहें हैं।
मन्दिरों में,गुरूद्वारों मे,चर्च में,जाएँ वहाँ आप को वृद्धजन ही दिखेगें युवा नहीं,बच्चे नही? ऐसा क्यो?
क्या अब तक का सारा धर्म बुढो़ का धर्म है।जो मौत के करीब आ गये हैं और जो मौत से भयभीत हैं,और मौत के चिन्तन के सम्बन्ध में आतुर हैं।
वे जानना चाहते हैं कि मौत के बाद क्या स्वर्ग ,नर्क ,मोक्क्ष या कुछ और।
जो धर्म मौत पर आधारित है वह जीवन को पैसे प्रभावित कर सकता है।हजारों वर्षो की धार्मिक सिक्षा के बाद भी पृथ्वी अधार्मिक होती जा रही है।
मन्दिर है ,मस्जिद है ,चर्च है,पूजरी हैं ,पादरी हैं लेकिन पृथ्वी धार्मिक नहीं हो सकी ।
क्या धर्म का आधार मृत्यु है?
aacha hai..
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